नीमच के कुंचड़ोद गाँव से उठी स्वदेशी की गूँज: 'पीएम विश्वकर्मा योजना' से प्रेरित युवा ने जूट और प्राकृतिक रंगों से बनाई प्रधानमंत्री की अनूठी कलाकृति

 

"Artist Rahul Kumar Lohar with PM Modi Painting made of natural colors"

प्रधानमंत्री जी की कालाकृति दिखाते चित्रकार राहुल कुमार लोहार 



नीमच (मध्य प्रदेश) | अरुण कुमार गौड़ देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शिल्पकारों के उत्थान के लिए शुरू की गई 'पीएम विश्वकर्मा योजना' और 'वोकल फॉर लोकल' का मंत्र अब ग्रामीण भारत की रगों में दौड़ने लगा है। इसका जीवंत उदाहरण मध्य प्रदेश के नीमच जिले के कुंचड़ोद गाँव में देखने को मिला है, जहाँ एक साधारण परिवार के युवा चित्रकार राहुल कुमार लोहार ने अपनी असाधारण प्रतिभा से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी माताजी की ममतामयी छवि को प्राकृतिक कैनवास पर उकेरा है।

कुंचड़ोद की माटी और जूट का संगम

​नीमच के छोटे से गाँव कुंचड़ोद के रहने वाले राहुल लोहार ने इस कलाकृति के लिए किसी महंगे विदेशी संसाधनों का मोह त्याग कर पूरी तरह स्वदेशी मार्ग चुना। उन्होंने जूट की बोरी (टाट) के टुकड़े को अपना आधार बनाया। इस पर ग्रामीण भारत की पारंपरिक 'लिपाई' तकनीक का प्रयोग करते हुए गाय के गोबर, पीली मिट्टी और मेथी बीज के पाउडर का लेप लगाया। यह तकनीक न केवल कलाकृति को एक अनोखा 'टेक्सचर' प्रदान करती है, बल्कि हमारी लुप्त होती ग्रामीण निर्माण कला को भी प्रदर्शित करती है।

प्राकृतिक रंगों से स्वदेशी का श्रृंगार

​राहुल ने इस चित्र में एक भी बूंद सिंथेटिक रंग का उपयोग नहीं किया है। उन्होंने प्रकृति की गोद से रंग तैयार किए हैं:

  • केवड़ियों के फूल से लाल और केसरिया रंग।
  • पियावड़ी पत्थर और पीली मिट्टी से स्वर्णिम आभा।
  • लकड़ी के कोयले से काला और चूना पाउडर से सफेद रंग।
  • ​रंगों को स्थायी बनाने के लिए खाने योग्य प्राकृतिक गोंद का उपयोग किया गया है।

'पीएम विश्वकर्मा योजना' और आत्मनिर्भरता का संदेश

​चित्रकार राहुल कुमार लोहार का यह प्रयास सीधे तौर पर केंद्र सरकार की 'पीएम विश्वकर्मा योजना' की भावना से मेल खाता है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों (जैसे लोहार, कुम्हार, चित्रकार) के कौशल को पहचान देना और उन्हें आधुनिक युग में आत्मनिर्भर बनाना है।

​राहुल कहते हैं, "प्रधानमंत्री जी ने विश्वकर्मा समुदाय और पारंपरिक शिल्पकारों को जो मान दिया है, उसी से प्रेरित होकर मैंने यह स्वदेशी चित्र तैयार किया है। कुंचड़ोद जैसे छोटे गाँव से मैं यह संदेश देना चाहता हूँ कि यदि हम अपनी जड़ों और पारंपरिक संसाधनों को अपनाएं, तो भारत का हर गांव आत्मनिर्भर बन सकता है।"

संस्कृति और राष्ट्रभक्ति का बेजोड़ उदाहरण

​माँ-पुत्र के निश्छल प्रेम को समर्पित यह कलाकृति केवल एक चित्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों का दर्पण है। नीमच के इस युवा कलाकार की इस कृति ने सिद्ध कर दिया है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो गाँव की पगडंडियों से निकलकर भी राष्ट्र सेवा और आत्मनिर्भरता का बड़ा संदेश दिया जा सकता है।




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